सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

खटखटा चोर चित्रकूट मध्य प्रदेश

चित्रकूट यात्रा

खटखटा चोर की कथा
विन्ध्य पर्वत और वनों से घिरे चित्रकूट को प्रकृति और ईश्वर की अनुपम देन कहा जाता है। मंदाकिनी नदी के किनारे बने अनेक घाट और मंदिरों में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। चित्रकूट मे दर्शनों हेतु अनेक स्थान है इन्हीं में से एक तीर्थ है गुप्त गोदावरी। यहां खटखटा चोर दर्शनार्थियों के कौतूहल और आकर्षण का केंद्र है। ऐसा माना जाता है कि ये खटखटा चोर पाप खाकर पेट भरता है और इसके दर्शन करने वाले के घर कभी भी चोरी नहीं होती।

चित्रकूट के गुप्त गोदावरी तीर्थ पर सदियों से ये परंपरा बरकरार है। देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालु गुफा के अंदर पत्थर के रूप में लटके इस चोर का पूजन करते हैं और प्रसाद चढ़ाते हैं। गुफा के आसपास दुकानदार व यहां रहने वाले अन्य लोगों से इस चोर के बारे में किवदंतियां सुनी जा सकती हैं।

यू श्राप बना वरदान

मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वनवास के 11 से 12 वर्ष यहीं बिताए थे। ायत्री शक्ति पीठ आश्रम चित्रकूट के प्रमुख डॉ. राम नारायण त्रिपाठी एक किवदंती सुनाते हैं। उनके अनुसार माता सीता एक दिन गुप्त गोदावरी गुफा में स्नान कर रहीं थी। इसी दौरान मयंक नाम के राक्षस ने उनके वस्त्र चोरी कर लिए। (यह वही दिव्य वस्त्र थे जो माता अनुसुइया ने सीता जी को भेंट दिये थे) इस पर सीता जी ने अपने सिर के बाल उखाड़ कर उसे श्राप दिया। इससे मयंक राक्षस पत्थर का बन गया। जब उसने अनुनय-विनय की कि इस तरह तो वह भूखा मर जाएगा। तब माता सीता ने उससे गुफा में आने वालों के पाप खाकर भूख मिटाने और युगो-युगों तक उसका नाम बने रहने का वरदान दिया।

इस तरह पड़ा #खटखटा नाम

सतना जिले के अंतर्गत चित्रकूट में गुप्त गोदावरी पर स्थित गुफा के अंदर पत्थर के रूप में लटके इस चोर को हिलाने से खटखट की आवाज होती है। इसलिए इसे खटखटा चोर कहा जाने लगा। ऐसा माना जाता है कि वह गुफा की सुरक्षा भी करता है। इसलिए छूने पर आवाज निकलती है। अब गुफा के अंदर इस स्थान पर एक मंदिर बना दिया गया है। लोग इस पर फल-फूल रुपये भी चढ़ाते हैं।

ऐसे मिलते हैं दर्शन


चित्रकूट में गुप्त गोदावरी में सीढिय़ों से चढ़कर जब प्रथम गुफा के अंदर पहुंचते हैं तो खटखटा चोर के दर्शन मिलते हैं। इससे आगे दूसरी गुफा में अलग-अलग कुंड दिखाई देते हैं।

सोमवार, 7 सितंबर 2020

रणछोर धाम एवं मचकुन्द गुफा (12 वीं शताब्दी का प्राचीन मंदिर पाषाण कालीन प्रतिमाऐ)

6 सितंबर को सन्डे लाकडाऊन मनाते हुए हमारी मैना ने उडान भर दी है । दो बाज मे ओर मित्र उमेश हम आज चलते है जीवन दायनी बेतवा के तीरे एक ओर प्रसिद्द धाम रणछोर धाम पर । वैसे हम मुंगावली से 15 किलोमीटर दूर घने जंगल मे एक प्रकृतिक स्थान महादेव खो के लिए निकले थे यहाँ मानसून मे बरसात होने पर पहाड की कंदराओ से बर्षा का जल आता है ओर प्राकृतिक झरना चलता है तो हम इसी अद्भुत कल्पना मे यहाँ आऐ मगर पिछले 10 दिनो से वारिश नही होने से झरना नही चल रहा था तो बस स्थान पर दर्शन कर यहाँ रहने वाले महाराज बिहार से है उनसे मिलकर आशीर्वाद् ले कर वापिस चल दिऐ यहाँ पहुँचने के लिऐ प्रधानमंत्री ग्राम सडक के गांव किरौला से जंगल के अंदर करीब 9 किलोमीटर की पगडंडियो पर से जाना होता है रास्ते की पहचान के लिऐ पगडंडियो पर लगे छोले बबूल आदी के पेडो पर लगे झंडे के निशान देखकर जाना पडता है क्योंकि जरा भटकने पर ही घने जंगल मे रास्ता भटकने का डर है।इन जंगलों मे शेर देखने की इच्छा थी लेकिन बस मोर से ही काम चलाना पडा । इस स्थान से वापिस आते मे घडी मे अभी 1 ही बजा था मतलब अभी पूरा सन्डे बाकी था तो मित्र उमेश की तो वापिस घर आने की इच्छा थी लेकिन उनकी इस इच्छा को हमने डामर रोड आने पर रणछोर धाम की ओर मोड दिया अब आगे। 

उत्तर प्रदेश बुंदेल खंड के पत्थरों का शहर कहे जाने वाले ललितपुर जिले मे धौलागिर पर्वत माला ओर बेतवा के किनारे महाभारत कालीन स्थान पर यहाँ किवदंती एवं मान्यता के अनुसार भगवान श्री कृष्ण जी इस स्थान पर आए थे एवं यहीं से उनका एक नाम रणछोर हुआ। यह स्थान अपनी हजारों साल पुरानी पौराणिक मूर्तियों के लिए भी पहचाना जाता है उत्तर प्रदेश के आखिरी छोर ओर मध्यप्रदेश की सीमा पर बसे बुंदेलखण्ड के रणछोर धाम पर आज भी कई अनछुए इलाके ऐसे हैं, जहां ये कलात्मक देव-मूर्तियां पर्यटकों की बाट जोह रही हैं। 

रणछोर धाम एवं मुचकुंद गुफा 
बारहवीं शताब्दी का है मंदिर

यह मन्दिर बारहवी शताब्दी के लगभग का माना जाता है जिसमें भगवान कृष्ण की अद्वितीय प्रतिमा के दर्शन होते हैं। यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे वातावरण में स्थित है। इस मंदिर के पास प्रसिद्ध मचकुंद की गुफा भी मौजूद है जहां पर ऋषि मुचकुंद ने अपना आश्रम बनाया था और उन्हीं के क्रोध के कारण राक्षस कालयवन का संहार हुआ था। वर्तमान समय में यह मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है।

यहाँ की खास बात यह कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में करोड़ों रुपये कीमत होने के चलते इन मूर्तियों पर जहां तस्करों का खतरा मंडरा रहा है, वहीं पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किए जाने के बाद भी इन मूर्तियों के गढ़ रणछोड़ धाम में विकास कार्य शून्य है एवं वर्तमान में जो विकास कार्य है वह बहुत धीमे है जिससे प्राचीन काल का यह ऐतिहासिक क्षेत्र आज भी उपेक्षित है।( यहाँ चित्र मे गर्भगृह की विष्णु जी की प्रतिमा है आप उसमे गर्दन पर लगे जोड को स्पष्ट देख सकते है)

रणछोड़ जी मंदिर हजारों वर्षों से लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। विश्व के तमाम प्राचीन मंदिरों में जहां भगवान की एकल प्रतिमा स्थापित है, वहीं इस मंदिर में स्थापित गरुड़ पर विराजमान विष्णु भगवान की दुर्लभ मूर्ति के अलावा शिव-पार्वती और कृष्ण की खास पाषाणकाल की मूर्तियां इसे बेहद विशिष्ट बनाती हैं।

पुरातत्व विभाग के सर्वे के मुताबिक यहाँ लगे बोर्ड से इस स्थान की प्रचीनता लगभग 12वीं शताब्दी के इस प्रस्तर मंदिर में अर्धमण्डप, मण्डप तथा गर्भगृह का विधान है। ऊर्ध्वछंद योजना की दृष्टि से इस मंदिर में अधिष्ठान, समतल छत आदि का प्रावधान है, जिसके ऊपर उत्तर मध्यकाल में निर्मित गुम्बद बना हुआ है। ललाटविम्ब पर गरुड़ारूढ़ विष्णु की प्रतिमा है। गर्भगृह के मध्य में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र सें से युक्त चतुर्दशभुजी विष्णु यानी रणछोड़ की गरुड़ारूढ़ प्रतिमा स्थापित है।

दोनों पाश्र्वों में शंखधारी और चक्रधारी की मूर्तियों के अलावा दोनों ओर अनुचर दर्शाए गए हैं। इसके अलावा गर्भगृह में प्रतिष्ठित दूसरी उमा-महेश की युगल प्रतिमा भी बेहद अनमोल और कलापूर्ण है। इतिहासकारों के मुताबिक यह पंचायत शैली का बेहद खास मंदिर है और मध्यकालीन वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है।


 मध्यकाल की इन अनमोल मूर्तियों को पुरातत्व विभाग ने भी संरक्षित स्मारक घोषित कर रखा है। बावजूद इसके सुरक्षा व्यवस्था की खामियों के चलते वर्ष 1990 में प्रमुख प्रतिमा की गर्दन चोरी हो गई थी। उस समय अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत 22 करोड़ रुपये आंकी गई थी। आठ साल बाद गर्दन वापस मिली और उसे मूर्ति में लगाकर प्रतिमा दोबारा प्रतिष्ठित की गई। 


यहाँ होती है खंडित मूर्ती की पूजा

हिंदू धर्म में खंडित मूर्ति की पूजा वर्जित है, मगर रणछोड़ धाम इसका प्रत्यक्ष अपवाद है, जहां आज भी भगवान विष्णु की प्रतिमा में गर्दन पर उसके काटे जाने का निशान साफ देखा जा सकता है। इतना सबकुछ होने के बाद भी यह सिद्धस्थल पुरातत्व विभाग और पर्यटन विभाग की जबरदस्त उपेक्षा झेल रहा है।

मान्यताओं के अनुसार, भगवान कृष्ण चूंकि इस स्थान पर युद्ध (रण) छोड़कर आए थे, इसलिए तभी से उनका नाम रणछोड़ पड़ गया। वहीं कई विद्वान इसे भगवान कृष्ण की बेजोड़ कूटनीति और रणकौशल का परिचय मानते हैं। उनके मुताबिक धर्म की रक्षा के लिए उठाया गया हर कदम जायज है, भले ही इसके लिए कूटनीति का सहारा क्यों न लेना पड़े। 

मंदिर से थोड़ी दूर पर विश्व विख्यात मचकुंद गुफा है। मचकुन्द धाम के पुजारी महाराज आसाराम दास जी ने हमें बताया कि मान्यता है कि दैत्य काल्यावन से युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण भागकर यहां आए थे। उनका पीछा करते-करते काल्यावन यहां पहुंचा, तब भगवान कृष्ण गुफा में तपस्या में लीन महाराज मचकुंद पर अपना पीतांबर डालकर छिप गए। काल्यावन ने जैसे ही पीतांबर खींचा, महाराज मचकुंद को मिले वरदान के अनुसार उनकी दृष्टि पड़ते ही काल्यावन भस्म हो गया।।
एवं ॠषि ने श्री कृष्ण जी से अपने रूप मे दर्शन देने का आग्रह किया तब श्री कृष्ण जी ने उन्हे अपने चतुर्भुज विष्णु रूप मे दर्शन दिऐ। यहाँ धौलागिर पर्वत पर मचकुन्द जी की गुफा के साथ एक ओर गुफा की श्र॔खला है जिसकी परिक्रमा कर यहाँ सिद्ध बाबा के स्थान पर दूर दराज से आए श्रद्धालु अपनी मनोकामना करते है। मानसून के समय बरसात होने पर यहाँ पहाडों पर से पानी गिरने से झरना चलता है जो बहुत ही मनमोहक लगता है । घने जंगलों के बीच बना यह स्थान अत्यंत ही मनमोहक है। यहाँ के जंगलों मे सागौन की भरमार है।


बस और ट्रेन की है सुविधा मंदिर के पास प्रमुख नगरों तक 

रणछोड़ मंदिर तक पहुंचने के लिए बस और ट्रेन की सुविधा उपलब्ध है। मध्य प्रदेश के सागर जनपद के बीना रेलवे स्टेशन या उत्तर प्रदेश के ललितपुर रेलवे स्टेशन पर उतरकर यहाँ पहुंचा जा सकता है। बीना रेलवे स्टेशन से प्राइवेट टैक्सी या चार पहिया वाहन से यहाँ पहुंचा जा सकता है जबकि ललितपुर रेलवे स्टेशन से भी प्राइवेट टैक्सी की सुविधा ली जा सकती है।

धौर्रा स्टेशन के निकट है मंदिर

उत्तरप्रदेश ललितपुर जिला मुख्यालय से रणछोड़ धाम की दूरी लगभग 50 किलोमीटर ललितपुर देवगढ़ से 30 किलोमीटर सकता है। दिल्ली-मुंबई रेल लाइन पर एक छोटा सा स्टेशन धौर्रा मौजूद है लेकिन इस स्टेशन पर केवल पैसेंजर गाड़ी ही रुकती है। धौर्रा रेलवे स्टेशन पर पैसेंजर गाड़ी के माध्यम से आकर यहां से केवल 5 किलोमीटर दूर रणछोड़ धाम मंदिर पहुंचा जा सकता है। इस रेलवे स्टेशन से मंदिर के लिए टैक्सियां मिल जाती है।
चंदेरी जाते हुऐ मुंगावली से इस स्थान की दूरी 26 किलोमीटर है। ललितपुर देवगढ़ दशावतार मंदिर से दूरी 35 किलोमीटर 
गर््भ गृृृह मे प्रा्चीन प्रतििमा मुचकुंद गुफा 

गुरुवार, 27 अगस्त 2020

भरखा जलप्रपात ओर शैलचित्र लिखिदांत

भरखा जल प्रपात ओर लिखिदांत शैलचित्र (भरखा धाम)

मुंगावली जिला अशोक नगर मध्यप्रदेश मेंरा घर   

 आधुनिकता  से दूर प्रकृति की गोद में बसा अत्यंत रमणीय स्थल भरखा जलप्रपात अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और मनोरम दृश्य के कारण इन दिनों काफी चर्चा में हैं यहां आए दिन आसपास के शहरों के युवा इस प्राकृतिक झरने का लुत्फ उठाने आ रहे हैं। यह स्थल प्राकृतिक के साथ-साथ शैल चित्रकला के लिए भी बहुत धनी क्षेत्र है।

    बेतवा की सहायक ओर नदी घाटी को देखकर यहां शैल चित्रों के होने की संभावना को प्रकट करते हुए मैंने भीमबेटिका के शैलचित्रों को जैसे ही गाय चराने वाले एक नवयुवक को दिखाया वह तुरंत इन्हें पहचान गया और उसने पूर्व दिशा की और लाल रंग से बने चित्रों की बात हमें बताई।  चरवाहों से पूछ पूछ कर घुमक्कड़ी का आनंद लेते हुए मैं और मित्र 👉उमेश कुशवाह  एक ऐसे स्थल पर पहुंच गए जहां हमें मिला शैल चित्रों का जखीरा जो हजारों वर्ष पहले के जीवन का सजीव चित्रण प्रदर्शित करता है।यहां गाय,बैल,बकरी, बारहसिंगा,पक्षी,स्त्री पुरुषों का स्वतंत्र अंकन तथा यहां पशुओं का चित्रण स्वाभाविक एवम यथार्थ ढंग से किया गया है।

स्थानीय लोग इस स्थल को लिखीदांत कहकर संबोधित करते हैं, वह बताते हैं कि इन चित्रों को देखने कई अंग्रेज लोग(विदेशी शोधकर्ता) इस स्थान पर आते हैं हालांकि पर्यावरण प्रदूषण,इंसानी हस्तक्षेप,लंबे समय के कारण यहां कई शैल चित्र धुंधले हो चुके हैं परंतु यह बहुत ही शानदार जगह है जहां थोड़ी मशक्कत के बाद पहुंचा जा सकता है इस यात्रा पर आए सभी साथियों का बहुत-बहुत धन्यवाद 


 👉कैसे पहुंचें -  मुंगावली और चंदेरी से यह स्थल क्रमशः 35,30 कि.मी दूर है। जहाँ ग्राम अररोंन- नानॉन होते हुए पहुंचा जा सकता है और भरखा झरने से 4km(पैदल) पूर्व दिशा में नदी के दाएं तट पर लिखिदांत शैलचित्रों तक पहुंच सकते हे

भरखा जलप्रपात 
शैैलचिित्र
शैैैैल चित्र

खटखटा चोर चित्रकूट मध्य प्रदेश

चित्रकूट यात्रा खटखटा चोर की कथा विन्ध्य पर्वत और वनों से घिरे चित्रकूट को प्रकृति और ईश्वर की अनुपम देन कहा जाता है। मंदाकिनी नदी के किनारे...